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छत्तीसगढ़ के बीजापुर में 25 मार्च 2026 को कुख्यात नक्सली कमांडर और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के सदस्य पापा राव द्वारा अपने 17 अन्य साथियों के साथ आत्मसमर्पण के साथ ही छत्तीसगढ़ से 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के खात्मे का लक्ष्य अब हकीकत में उतरने के बिलकुल दहलीज पर आ गया है। पापा राव बस्तर में सक्रिय नक्सवादियों की अग्रिम पंक्ति में शामिल आखिरी कमांडर था। उसके आत्मसमर्पण के बाद अब बस्तर में नक्सलवादियों का नेतृत्व पूरी तरह से खत्म हो चुका है। बस्तर और छत्तीसगढ़ अब हिंसामुक्त एक नयी सुबह के लिए पूरी तरह से तैयार है।

दो साल पहले जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने यह घोषणा की थी कि 31 मार्च 2026 तक पूरे छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद से मुक्त करा लिया जाएगा, तब स्थितियां इतनी आसान नहीं थीं। क्योंकि उस समय छत्तीसगढ़ में करीब चार हजार नक्सलवादी सक्रिय थे। गृहमंत्री के संकल्प को पूरा करने के लिए छत्तीसगढ़ पुलिस ने बस्तर के आईजी श्री सुंदरराज पी. के मार्गदर्शन में तथा अन्य केंद्रीय बलों के सहयोग से बस्तर में पाँच सूत्री योजना पर जोर-शोर से काम शुरू किया। पाँच विभिन्न स्तरों पर किए गए पिछले दो सालों के प्रयासों का ही यह परिणाम है कि तय की गई डेटलाइन खत्म होने से पहले ही बस्तर में अब माओवादियों का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर पहुँच गया है।

पुलिस और प्रशासन की इस पाँच सूत्री योजना में विश्वास, विकास, सुरक्षा, सेवा और न्याय शामिल था। इसके अंतर्गत कई स्तरों पर एक साथ काम किया गया। पुलिस के सहायक संगठन डिस्ट्रिक रिजर्व गार्ड (डीआरजी) में पूरी तरह से स्थानीय युवक-युवतियों को नियुक्त किया गया। इसके लिए उन्हें शिक्षा की पात्रता तथा कद के मापदंड में छूट दी गई। डीआरजी की स्थापना 2015 में स्थानीय युवाओं (विशेषकर बस्तर के) और आत्मसमर्पित माओवादियों को शामिल करके की गई थी, जिन्हें इलाके की भौगोलिक और भाषाई समझ थी। स्थानीय परिस्थितियों से अच्छी तरह से परिचित होने के कारण ये जवान कई दिनों तक जंगल में रहने, लंबी गश्त करने और खुफिया जानकारी के आधार पर सटीक कार्रवाई करने में सक्षम थे। बस्तर में नक्सल विरोधी अभियानों में, खासकर अबूझमाड़ और बीजापुर-सुकमा के घने जंगलों में, सुरक्षाबलों की 90% से अधिक सफलता में डीआरजी की मुख्य भूमिका रही है। इसके अलावा वर्ष 2021 में गठित एक अन्य सहयोगी इकाई बस्तर फाइटर्स को भी मजबूत किया गया। इन दोनों इकाइयों का बस्तर पुलिस द्वारा शुरू की गई सामुदायिक पुलिसिंग की अवधारणा को धरातल पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका रही।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में ग्रामीण जनता में पुलिस के प्रति अविश्वास, डर की भावना को खत्म करने, पुलिस और जनता के बीच संबंध को मजबूत करने के उद्देश्य से पुलिस द्वारा सामुदायिक पुलिसिंग के अंतर्गत आमचो बस्तर आमचो पुलिस अभियान शुरू किया गया। इस अभियान के तहत् पुलिस ने ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर स्थानीय भाषा-बोलियों में बात की, ग्रामीणों की समस्याएं सुनी, स्थानीय आदिवासियों के साथ मिलकर त्यौहार मनाए और उनकी दैनिक समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया। इससे पुलिस-जनता के बीच विश्वास बढ़ा।

अगले चरण में पुलिस ने सरकार की विकास योजनाओं और कार्यक्रमों को आदिवासी क्षेत्रों में पहुँचाने में सहयोग किया। स्थानीय युवाओं को शिक्षा, रोजगार, खेल और अन्य विकास गतिविधियों में शामिल कर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा। क्षेत्र में सुरक्षा को मजबूत करने के लिए विभिन्न आदिवासी इलाकों में पुलिस और सुरक्षा बलों के कैम्प स्थापित किए गए। चार सौ से ज्यादा कैम्पों को स्थापित कर उन्हें समेकित विकास केंद्र के रूप में विकसित किया गया ताकि इनके जरिए सरकारी योजनाओं का लाभ, शिक्षा और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं लोगों तक पहुँचाई जा सके।

पुलिस ने गाँवों में विकास योजनाओं को लागू करने में स्थानीय लोगों की इच्छा और भागीदारी को सुनिश्चित किया। प्रत्येक पुलिस कैम्प के आठ से दस किलोमीटर के दायरे में स्कूल, आंगनवाड़ी, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, राशन दुकान, बिजली, बैंक जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की कोशिश की। सुदूर क्षेत्रों में शिक्षाविहीन गाँवों की पहचान की गई और नियद नेल्ला नार योजना के अंतर्गत नये विद्यालय खोले गए। वर्ष 2024-25 में ऐसे 13 नये विद्यालय खोले गए जिनमें जिला बीजापुर में पोरोवाड़ा, इन्दरीनार, हिरमागुंडा, इर्रेनार, रेगड़गट्टा और गोल्लागुडेम गाँवों में जबकि सुकमा जिले में पोकड़ीपारा, मुकराजकोंडा, गुंडराजपाड़, छोटेकेडवाल और पुलनपाड़ में प्राथमिक विद्यालय शुरू किए गए। इसके अलावा नक्सलवाद के कारण बंद हुए 35 विद्यालयों को फिर से शुरू किया गया।

गाँवों को जोड़ने और संपर्क सुविधाएं बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर सड़कों का निर्माण किया गया। इंद्रावती नदी पर तीन पुल बनाए गए। चौथा अभी निर्माणाधीन है। पहली बार देश के भीतरी हिस्से में सड़कों के निर्माण के लिए सीमा सड़क संगठन की सहायता भी ली गई।

नक्सलवाद के विरुद्ध जंग में एक महत्वपूर्ण भूमिका डिजिटल कनेक्टिविटी ने भी निभाई। इसके लिए क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मोबाइल टॉवर स्थापित किए गए ताकि आदिवासी क्षेत्र की नयी पीढ़ी बाकी दुनिया से आसानी से जुड़ सके। क्षेत्र में खेल की गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए बस्तर ऑलंपिक का आयोजन किया गया। इसके अलावा बस्तर पंडुम के माध्यम से बस्तर के सांस्कृतिक वैभव को पूरे देश और दुनिया में पहुँचाने के प्रयास भी किए गए।

नक्सलवाद के खिलाफ छेड़ी गई इस मुहिम में पुलिस के अलावा भारतीय वायुसेना, आईटीबीपी, सीआरपीएफ, बीआरओ, एसटीएफ जैसे केंद्रीय व राज्य बलों का सहयोग भी महत्वपूर्ण रहा। इसके अलावा इसरो, एनटीआरओ और एनएसजी के बम निरोधक दस्तों की सहायता भी ली गई। इन सबके सक्रिय और समेकित सहयोग से माओवादियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर सटीक और सतत् अभियान चलाना संभव हो पाया। पुलिस और सुरक्षा बलों के अभियानों में वर्ष 2024 में 217, वर्ष 2025 में 256 जबकि वर्ष 2026 में अब तक 26 नक्सलवादी मारे जा चुके हैं। इसके अलावा वर्ष 2024 में 929, वर्ष 2025 में 898 और वर्ष 2026 में 26 नक्सलवादियों को गिरफ्तार किया गया।

पहले जहाँ पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ होने वाली मुठभेड़ों के समय शीर्ष माओवादी, कमांडर और केंद्रीय समिति के सदस्य सामान्य कार्यकर्ताओं को मरने के लिए आगे करके बचकर भाग निकलते थे, वहीं पिछले दो सालों में पुलिस का जोर ऐसी मुठभेड़ों में शीर्ष माओवादी नक्सल कैडर को मार गिराने पर रहा। पिछले एक साल के भीतर ही बसवा राजू, जयराम रेड्डी, प्रयाग मांझी, थेटू लक्ष्मी, गजराला रवि, सहदेव सोरेन, रामचंद्र रेड्डी, सत्यनारायण रेड्डी, माडवी हिड़मा, गणेश उईके, कुहड़ामी जगदीश जैसे 16 से ज्यादा शीर्ष माओवादी पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। इसकी वजह से कई शीर्ष नक्सली कमांडरों ने आत्म-समर्पण का रास्ता चुनना बेहतर समझा।

साथ ही इलाके के माओवादी कैडरों को आत्म-समर्पण कर मुख्यधारा से जुड़ने के लिए भी लगातार प्रेरित किया गया। इसके लिए “पूना मारेगम” जैसा अभियान चलाया गया। इसके अंतर्गत पुनर्वास से पुनर्जीवन का संदेश दिया गया। जो माओवादी आत्म-समर्पण के लिए तैयार हुए उन्हें वित्तीय सहायता, व्यावसायिक प्रशिक्षण, आजीविका के अवसर प्रदान किए गए ताकि वे सम्मानजनक जीवन जीते हुए समाज की मुख्यधारा में पुनःस्थापित हो सकें।

इस अभियान से प्रभावित होकर वर्ष 2024 में 792, वर्ष 2025 में 1573 और वर्ष 2026 में अब तक करीब 400 माओवादियों ने हिंसा त्यागकर आत्म-समर्पण किया है। इन्हें शासन की पुनर्वास नीति के तहत आर्थिक सहायता और अन्य सुविधाएं प्रदान की गई हैं। इस मामले में 17 अक्तूबर 2025 का दिन इस मायने में ऐतिहासिक रहा कि उस दिन बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर में रिकार्ड 210 माओवादियों ने आत्म-समर्पण किया।

नक्सली कमांडर पापा राव के साथियों के साथ आत्म-समर्पण के बाद एक समय चार हजार से ज्यादा सक्रिय माओवादियों वाले छत्तीसगढ़ में सक्रिय माओवादियों की संख्या 25 से भी कम रह गई है। एक ओर सख्ती और दूसरी ओर संवेदनशीलता के मिले-जुले प्रयासों और सतत् सेवा और सहायता की भावना से काम करने के कारण अब बस्तर और छत्तीसगढ़ हिंसा के अंधेरे को पीछे छोड़कर शांति और समृद्धि के नये सवेरे के लिए पूरी तरह से तैयार है।

(लेखक पराग मांदले केंद्रीय संचार ब्यूरो भोपाल में सहायक निदेशक हैं)

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