रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में दिव्य दरबार और प्रेत दरबार के आयोजन को लेकर अनुमति का मुद्दा गरमाया हुआ है। मां मातंगी दिव्यधाम के पीठाधीश्वर डॉ. प्रेमासाईं महाराज ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि धार्मिक आयोजनों को लेकर उनसे भेदभाव क्यों किया जा रहा है?

जब बागेश्वर धाम के कार्यक्रमों में दिव्य दरबार और प्रेत दरबार लगते हैं, तब स्थानीय प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं होती और कार्यक्रमों पर रोक नहीं लगाई जाती। ये स्थानीय संतों का और मेरा अपमान है। इस तरह के धार्मिक आयोजन की अनुमति देने में आपत्ति क्यों है?अनुमति नहीं मिली तो अन्न त्याग कर करेंगे आंदोलनमहाराज ने चेतावनी दी कि यदि दिव्य दरबार के आयोजन की अनुमति नहीं मिली, तो वे उसी स्थान पर अन्न त्याग कर अनशन पर बैठ जाएंगे। उन्होंने कहा कि इस धार्मिक आयोजन में देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। आयोजकों के अनुसार, कार्यक्रम में लगभग 35 से 40 हजार श्रद्धालु शामिल हो सकते हैं। ऐसे में अनुमति को लेकर प्रशासन के निर्णय पर सभी की नजरें टिकी हैं। महाराज जी ने कहा कि उनका आंदोलन सरकार या मुख्यमंत्री के खिलाफ नहीं होगा, बल्कि प्रशासन की कार्यप्रणाली के विरोध में होगा।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री अच्छे हैं और सरकार भी अच्छी है। मुख्यमंत्री से उनकी भेंट भी हुई है और मुख्यमंत्री की ओर से उन्हें आश्वासन भी मिला है।महाराज कहा कि 24 से 28 अक्टूबर तक अवधपुरी मैदान गुढ़ियारी में यदि पहली बार दिव्य दरबार आयोजित करने में प्रशासन को कोई परेशानी है, तो वे इस बार अनुमति नहीं मिलने की स्थिति को स्वीकार कर सकते हैं। लेकिन भविष्य में नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। यदि एक संत को इस प्रकार के आयोजन की अनुमति दी जाती है, तो दूसरे संतों के साथ भी समान व्यवहार किया जाना चाहिए।

उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर संतों को रोकने का प्रयास क्यों किया जा रहा है और इस तरह का भेदभाव क्यों किया जा रहा है ?मुख्यमंत्री और सरकार को बदनाम करने का प्रयास महाराज ने कहा कि धार्मिक आयोजनों पर रोक लगाने या अनुमति के मामले में भेदभाव किए जाने से सरकार और मुख्यमंत्री की छवि प्रभावित हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग इस तरह की परिस्थितियां पैदा कर मुख्यमंत्री का नाम खराब करने का प्रयास कर रहे हैं।

उन्होंने दोहराया कि उनका उद्देश्य मुख्यमंत्री या सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि प्रशासन से समानता और निष्पक्षता की मांग करना है। उनका कहना है कि धार्मिक आयोजनों की अनुमति के मामले में सभी संतों और आयोजकों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि इस मामले में स्पष्ट निर्णय लिया जाए, ताकि किसी भी संत या धार्मिक आयोजन के साथ भेदभाव की स्थिति पैदा न हो।